
होरी खेलत हैं बनवारी ले सब ब्रजगोपिन को संग।
केसर कुंकुमा अरगजा चोवा,विविध भांति के रंग ||1||
कुसुमन विलसित हैं नवकुंज सबे,नव लतिका वृन्द ||2||
डिम डिम डिम डिम दुंदभी बाजे, बाजे ढोल ताल मृदंग ||3||
लाज लजाई,कंचुकी चिरकूट भई, सारी बची नहि अंग ||4||
बनी सभी सुन्दिरिन लुगाई,चढ़ी स्याम परस की भंग ||5||
कुच फूले जोबन अह्लादित,अंगिया हो गई तंग ||6||
'स्यामदास' के प्रभुन बिहारीजी,डूबे उन्मादित उतंग ||7||
''जय श्री राधे कृष्णा ''
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