Kabir Das

भक्त कबीर जी के शब्द - १४१ से १५० तक

141. सिव की पुरी बसै बुधि सारु सिव की पुरी बसै बुधि सारु ॥ तह तुम्ह मिलि कै करहु बिचारु ॥ ईत ऊत की सोझी परै ॥ कउनु करम मेरा करि करि मरै ॥१॥ निज पद ऊपरि लागो धिआनु ॥ राजा राम नामु मोरा ब्रहम गिआनु ॥१॥ रहाउ ॥ मूल दुआ…

भक्त कबीर जी के शब्द - १२१ से १४० तक

121. जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै जैसे मंदर महि बलहर ना ठाहरै ॥ नाम बिना कैसे पारि उतरै ॥ कु्मभ बिना जलु ना टीकावै ॥ साधू बिनु ऐसे अबगतु जावै ॥१॥ जारउ तिसै जु रामु न चेतै ॥ तन मन रमत रहै महि खेतै ॥१॥ रहाउ ॥ जैसे हलह…

भक्त कबीर जी के शब्द - १०१ से १२० तक

101. प्रहलाद पठाए पड़न साल प्रहलाद पठाए पड़न साल ॥ संगि सखा बहु लीए बाल ॥ मो कउ कहा पड़्हावसि आल जाल ॥ मेरी पटीआ लिखि देहु स्री गोपाल ॥१॥ नही छोडउ रे बाबा राम नाम ॥ मेरो अउर पड़्हन सिउ नही कामु ॥१॥ रहाउ ॥ संडै मरकै कहि…

भक्त कबीर जी के शब्द - ८१ से १०० तक

81. देही गावा जीउ धर महतउ बसहि पंच किरसाना देही गावा जीउ धर महतउ बसहि पंच किरसाना ॥ नैनू नकटू स्रवनू रसपति इंद्री कहिआ न माना ॥१॥ बाबा अब न बसउ इह गाउ ॥ घरी घरी का लेखा मागै काइथु चेतू नाउ ॥१॥ रहाउ ॥ धरम राइ जब लेखा मा…

भक्त कबीर जी के शब्द - ६१ से ८० तक

61. राम सिमरि राम सिमरि राम सिमरि भाई राम सिमरि राम सिमरि राम सिमरि भाई ॥ राम नाम सिमरन बिनु बूडते अधिकाई ॥१॥ रहाउ ॥ बनिता सुत देह ग्रेह स्मपति सुखदाई ॥ इन्ह मै कछु नाहि तेरो काल अवध आई ॥१॥ अजामल गज गनिका पतित करम कीने…

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