तेरी आस में हर साँस रुक-रुक के चल रही है



तेरी आस में हर साँस रुक-रुक के चल रही है
कब आओगे गिरिधारी बयार भी बदल रही है |

मेरे आस के दीपक की लौ बूझ-बूझ के जल रही है
जल -जल के पल-पल वो तेरी ही राह तक रही है ||1||

जन्म-जन्म से प्यासी अँखियाँ तेरे दर्शन को तरस रही है
पथराई अँखियों से भी बूंदों की लड़ियाँ बरस रही हैं ||2||

भीगीं पलकें नैना छलके धड़कन भी जैसे तड़प रही है
न साँसे ही चल रही है न जान ही निकल रही है ||3||

''जय श्री राधे कृष्णा ''


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