
म्हारा प्रीतमा घर आवो जी।
दरस बिना दुखे नैन मोरे आकर
गरवा लगावो जी।
मैं तेरी दासी जन्म जन्म की,
गिरधर मैं तेरी कई जन्म की,
मोहे ना बिसरावो जी||1||
साज सिंगार कछु न भावे,
बिरहनी रोय रोय नीर बहावे
और देरी नाय लावो जी||2||
देह में प्राण काहे धरूँ मैं,
गिरधर तोसे मनुहार करूँ मैं,
काहे जिया जरावो जी।||3||
जै श्री राधे कृष्ण
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श्री कृष्णायसमर्पणं
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