
कहाँ है, ओ अनंत के वासी ?
तू मन मे है फिर भी आँखे हैं दर्शन की प्यासी |
प्रेम-भक्ति के तार भले ही मैंने तुझ से बाँधे
रह-रहकर उठ रहे विवादी सुर भी उनसे आधे ||1||
कितनी बार स्पर्श तेरा मैंने मस्तक पर पाया
कितनी बार डूबते मुझको तू तट पर ले आया ||2||
फिर भी क्यों हटती न हटाये चिंता की गलफाँसी
गिरते-पड़ते भी जो तुझ तक आने का अभिलाषी ||3||
''जय श्री राधे कृष्णा ''
~~
0 Comments: