मत रोक डगरिया मुरलीधर, दधि बेच मुझे घर जाना है...तू






मत रोक डगरिया मुरलीधर, दधि बेच मुझे घर जाना है...
तू देर न कर सुन ग्वालिन री, मुझे भूख लगी दधि खाना है...


घर रोज तुझे तेरी माता, क्या भोजन नहीं कराती है...?
भोजन तो करा देती हैं, मगर तुझे देख भूख लग आती है...
जल्दी से मुझे दधि दै दे, नहीं फिर पीछे बड़ा पछताना है ||1||



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मैं तेरे घर पर जाऊँगी और तुझे ठीक करवाऊँगी,
मैं मात यशोदा से कहूँगी तेरे लाल ने मटकी फोड़ी हैं...

नंदलाल को प्रिय वृषभानु लली, और राधे को प्रिय मनमोहना है||2||





तू मेरे घर पर जाएगी, मईया से डांट लगवाएगी,
मैं ग्वाल गवाह करवा दूंगा, ये ग्वालिन बड़ी चखोरी है..

खुद खा के, दही बिखरा के, दही मुख आप ने मेरा साना है....
सब गोपी कहें मन अपने में, बेकार का झगड़ा ठाना है||3||



जय श्री राधे कृष्ण
श्री कृष्णाय समर्पणम्


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