जानि परव संक्रांति,नंदघर,गर्गादिक मिलि आये हो।।देखि तहां ब्रिजराज मुदित मन,भीतर











जानि परव संक्रांति,नंदघर,
गर्गादिक मिलि आये हो।।
देखि तहां ब्रिजराज मुदित मन,
भीतर भवन बुलाये हो ।।१।।

दोऊ कर जोरी,किये पद वंदन.
करि सनमान बैठाये हो ।।
सब हि विप्र,मिलि,वेध मंत्र पढि,
सब आसिस सुनाये हो।।२।।

महरि जसोदा,अति हरखित मन,
लालन उबटि न्हवाये हो ।।
करि सिंगार,दे विविध सामग्री,
मेवा गोद भराये हो ।।३।।

कहत जसोदा दोऊ भैया मिलि.
दान देहो मन भाये हो।।
आज परब संक्रांति को दिन,
खेलो सखन बुलाये हो ।।४।।

यह सुनि बचन,हरखि बल मोहन,
धाय महर पै आये हो ।।
देखि मुदित ब्रिजराज..
हुलसि के लीने कंठ लगाये हो।।५।।






जै श्री राधे कृष्ण
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श्री कृष्णायसमर्पणं



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